‘मां की गाली’ देना अपराध है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
SUPREME COURT नई दिल्ली। क्या किसी को ‘मां की गाली’ देना अपने आप में अपराध माना जाएगा? क्या इसके लिए अश्लीलता का केस चलाया जा सकता है? इस अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि हर गाली या अपमानजनक शब्द कानूनी रूप से अश्लील नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि अभद्र भाषा, अशिष्टता और अश्लीलता तीन अलग-अलग बातें हैं। केवल गाली-गलौज या अपशब्दों का इस्तेमाल करने से भारतीय कानून के तहत अश्लीलता का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।
अश्लीलता की कानूनी परिभाषा बताई
कोर्ट ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देता हो, लोगों की नैतिकता को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखता हो और कानून में तय अन्य शर्तों को पूरा करता हो। केवल किसी शब्द से नाराजगी, असहजता या अपमान महसूस होना उसे अश्लील अपराध नहीं बनाता।
तमिलनाडु के मामले पर सुनवाई
यह फैसला तमिलनाडु के एक कृषि भूमि विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया। वर्ष 2017 में हुए विवाद में आरोपी पर शिकायतकर्ता के साथ मारपीट करने और मां की गाली देने का आरोप था। साथ ही आरोप था कि उसने बाद में धारदार हथियार से हमला कर शिकायतकर्ता को घायल कर दिया था। मेडिकल जांच में शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई थी।
अश्लीलता के आरोप से मिली राहत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द भले ही आपत्तिजनक और असभ्य हों, लेकिन वे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(b) के तहत अश्लीलता की कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस धारा के तहत यह साबित होना जरूरी है कि सार्वजनिक स्थान पर इस्तेमाल किए गए शब्दों से अन्य लोगों को वास्तविक परेशानी या झुंझलाहट हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को धारा 294(b) और धारा 506(ii) के आरोपों से राहत दे दी।
मारपीट के मामले में सजा बरकरार
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को आईपीसी की धारा 326 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का दोषी माना। अदालत ने आरोपी की उम्र करीब 70 वर्ष और स्वास्थ्य को देखते हुए सजा में राहत देते हुए अदालत उठने तक की सजा सुनाई और 50 हजार रुपये जुर्माना भरने का निर्देश दिया।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी शब्द को अपराध मानने के लिए केवल उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका संदर्भ, उद्देश्य और प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है। अदालत का यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भाषा और आपराधिक कानून के बीच स्पष्ट अंतर को रेखांकित करता है।