रायपुर। डकूनी-सूरत रेल माल गलियारे के लिए जमीन अधिग्रहण से पहले रायपुर में मुआवजा बढ़ाने के खेल का शक गहराता जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब कलेक्टर ने 15 जून को जमीनों की खरीदी-बिक्री, बटांकन और डायवर्जन पर रोक लगा दी थी, तो इसके बाद भी जमीनों के डायवर्जन की कार्रवाई कैसे होती रही?
दस्तावेजों में सामने आई जानकारी के मुताबिक, करीब 25 प्रकरणों में लगभग 35 एकड़ कृषि भूमि का उपयोग औद्योगिक और व्यावसायिक किए जाने की कार्रवाई हुई। इन प्रकरणों में रायपुर एसडीएम नंद कुमार चौबे के कार्यालय स्तर से हुई कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है।
रोक कलेक्टर की थी, फिर नंद कुमार चौबे के स्तर से कार्रवाई कैसे हुई?
15 जून को जारी आदेश में भूमि की खरीदी-बिक्री, बटांकन और डायवर्जन पर स्पष्ट रोक लगाई गई थी। आदेश की प्रतियां संबंधित राजस्व अधिकारियों तक भेजी गई थीं।
इसके बावजूद 20 जून, 19 जुलाई और 30 जुलाई को डायवर्जन की कार्रवाई सामने आई।
यहीं से एसडीएम नंद कुमार चौबे की भूमिका पर सवाल खड़ा हो रहा है।
जब प्रतिबंध का आदेश जारी हो चुका था, तब उनके कार्यालय से जुड़े प्रकरणों में डायवर्जन की कार्रवाई किस आधार पर हुई? क्या संबंधित अधिकारियों को रोक की जानकारी नहीं थी? और अगर जानकारी थी तो प्रतिबंध के बावजूद फाइलें आगे कैसे बढ़ीं?
अधिग्रहण से पहले जमीन महंगी करने का खेल?
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि ये जमीनें ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां रेल परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण प्रस्तावित है। गुमा, तेंदुआ, कोरा, कुम्हारी, चिखली, मुरठी और परसराई समेत कई गांवों की जमीनें अधिग्रहण के दायरे में आने की बात है।
कृषि जमीन को औद्योगिक या व्यावसायिक उपयोग में बदलने से उसके मूल्यांकन पर असर पड़ सकता है। ऐसे में अधिग्रहण से पहले हुए डायवर्जन की टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है।
क्या कृषि जमीनों का उपयोग बदलकर संभावित मुआवजा बढ़ाने की तैयारी की जा रही थी?
और अगर ऐसा नहीं था तो प्रतिबंध के बाद इन जमीनों के डायवर्जन की जरूरत ही क्यों पड़ी?
बाद में प्रकरण निरस्त करने की नौबत क्यों आई?
मामला सामने आने के बाद संबंधित प्रकरणों को पुनरीक्षण में लेकर दोबारा जांच और निरस्तीकरण के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते। जिस प्रक्रिया पर बाद में पुनरीक्षण और निरस्तीकरण की कार्रवाई करनी पड़ी, वह शुरू ही कैसे हुई?
यही वह बिंदु है जहां नंद कुमार चौबे की भूमिका की जांच जरूरी हो जाती है।
दस्तावेजों में दर्ज तारीखें, डायवर्जन आदेश और संबंधित फाइलों की नोटशीट यह स्पष्ट कर सकती हैं कि किस स्तर पर निर्णय हुआ और प्रतिबंध के बावजूद कार्रवाई क्यों आगे बढ़ी।
भारतमाला की तर्ज पर फिर मुआवजे का खेल?
रायपुर में भारतमाला परियोजना के दौरान जमीनों के टुकड़े कर मुआवजा बढ़ाने के आरोपों ने पहले ही बड़ा विवाद खड़ा किया था। अब रेल परियोजना के अधिग्रहण से पहले जमीनों के डायवर्जन का मामला सामने आने से उसी तरह की आशंका फिर पैदा हो गई है।
इस बार जांच का केंद्र होना चाहिए—
डायवर्जन की तारीख, जमीन का रकबा, पुराने और नए उपयोग का दर्जा, जमीन का मूल्य और संभावित अधिग्रहण मुआवजा।
अगर इन सभी कड़ियों को जोड़ने पर जमीन का मूल्य और संभावित मुआवजा बढ़ता दिखाई देता है, तो यह महज राजस्व प्रक्रिया की गलती नहीं बल्कि पूरे मामले की गहरी जांच का आधार बन सकता है।
अब सवाल सिर्फ डायवर्जन का नहीं
15 जून को रोक।
20 जून को डायवर्जन।
19 जुलाई को डायवर्जन।
30 जुलाई को डायवर्जन।
इन तारीखों के बीच हुई कार्रवाई और उसमें एसडीएम नंद कुमार चौबे के कार्यालय की भूमिका अब जांच का अहम बिंदु है।
क्या यह प्रशासनिक चूक थी, नियमों की अनदेखी थी या अधिग्रहण से पहले जमीनों का मूल्य बढ़ाने की कोशिश?
जवाब दस्तावेजों की जांच से सामने आना बाकी है—लेकिन फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड ने नंद कुमार चौबे की भूमिका पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
