छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति की तलाक याचिका मंजूर कर ली है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दहेज प्रताड़ना या घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है, लेकिन जब पति और उसके परिवार के सदस्य मुकदमे में बरी हो जाएं और इसके बाद भी लगातार उन फैसलों को चुनौती देते हुए कानूनी कार्रवाई जारी रखी जाए, तो मामले की पूरी परिस्थितियों को देखते हुए इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
यह फैसला जांजगीर निवासी विशंभर प्रसाद राठौर (29) की याचिका पर सुनाया गया। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की युगलपीठ ने परिवार न्यायालय के विवाह से जुड़ा है। पति ने तलाक की मांग करते हुए पत्नी पर दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और घर में अशांति पैदा करने के आरोप लगाए थे पुराने आदेश को रद्द करते हुए 2 जून 2015 को हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
2015 में हुई थी शादी
मामला वर्ष 2015 में विशंभर प्रसाद राठौर और कोरबा निवासी उनकी पत्नी मनीषा राठौर (30) के विवाह से जुड़ा है। पति ने तलाक की मांग करते हुए पत्नी पर दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और घर में अशांति पैदा करने के आरोप लगाए थे।
पति की ओर से पत्नी की मानसिक बीमारी की जानकारी शादी से पहले छिपाए जाने का आरोप भी लगाया गया था। हालांकि परिवार न्यायालय ने 8 अगस्त 2019 को इन आधारों पर तलाक देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी थी।
इसके बाद मामले की अपील हाईकोर्ट में पहुंची और इस दौरान वैवाहिक विवाद से जुड़े बाद के न्यायिक फैसलों को भी रिकॉर्ड पर लिया गया।
दहेज केस में पति समेत सात आरोपी बरी
मामले के दौरान पत्नी की शिकायत पर पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज हुआ। इस मामले में 14 दिसंबर 2023 को सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया गया।इसके बाद इस फैसले के खिलाफ पत्नी की ओर से की गई अपील भी 7 मार्च 2025 को खारिज हो गई।
इसी क्रूरता नहीं माना जा सकता। लेकिन इस मामले में दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों में पति और उसके परिवार के सदस्यों के बरी होने के बाद भी तरह घरेलू हिंसा कानून के तहत दायर आवेदन भी खारिज हुआ था और उसकी अपील 23 अगस्त 2024 को निरस्त कर दी गई थी।
लगातार कानूनी कार्रवाई को लेकर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी पत्नी या पति द्वारा कानूनी शिकायत दर्ज कराना मात्र मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। लेकिन इस मामले में दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों में पति और उसके परिवार के सदस्यों के बरी होने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया लगातार जारी रहने को कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों की पृष्ठभूमि में देखा।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के रानी नरसिम्हा शास्त्री और राकेश रमन से जुड़े फैसलों का भी हवाला दिया। कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में लगातार चलती कानूनी कार्यवाही से पति को मानसिक पीड़ा, तनाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने पत्नी के आचरण को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना।
मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक का दावा नहीं माना
हालांकि कोर्ट ने पति की ओर से पत्नी की मानसिक बीमारी को तलाक का आधार बनाने की दलील स्वीकार नहीं की। अदालत के समक्ष पेश मेडिकल रिकॉर्ड में डॉक्टर ने बीमारी का इलाज संभव बताया था। साथ ही यह भी कहा गया था कि उपचार के बाद पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकती है।
कोर्ट ने माना कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं कि बीमारी विवाह से पहले से हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी वाले आधार को स्वीकार नहीं किया, लेकिन मामले की अन्य परिस्थितियों और लगातार चली कानूनी कार्यवाही को मानसिक क्रूरता माना मौजूद थी और इतनी गंभीर थी कि पति से पत्नी के साथ रहने की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने विवाह समाप्त करने का दिया आदेश
अंततः हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी वाले आधार को स्वीकार नहीं किया, लेकिन मामले की अन्य परिस्थितियों और लगातार चली कानूनी कार्यवाही को मानसिक क्रूरता माना। युगलपीठ ने 8 अगस्त 2019 के परिवार न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए पति की याचिका मंजूर कर ली और 2 जून 2015 को हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।