BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऑटिज्म और स्पीच डिसऑर्डर से पीड़ित 14 वर्षीय बच्चे के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ बालिग होने की उम्र पूरी होने से ऐसे बच्चे का भरण-पोषण बंद नहीं किया जा सकता, जो मानसिक या शारीरिक स्थिति के कारण खुद अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने आदेश दिया कि बच्चे के पिता को 7,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि बालिग होने के बाद भी देनी होगी। यह भुगतान तब तक जारी रहेगा, जब तक बच्चा स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हो जाता।
फैमिली कोर्ट ने केवल बालिग होने तक दिया था भरण-पोषण
मामले में बच्चे की मां ने धारा 125 के तहत पिता से भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट, दुर्ग ने 9 जुलाई 2026 को पिता को बच्चे के लिए हर महीने 7,000 रुपये देने का आदेश दिया था। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इस भरण-पोषण को बच्चे के बालिग होने तक ही सीमित रखा था। इसके बाद बच्चे की ओर से हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई।
विशेष शिक्षा और लगातार देखभाल की जरूरत
याचिका में बताया गया कि बच्चे को ऑटिज्म और स्पीच डिसऑर्डर है। उसे विशेष शिक्षा, उपचार और निरंतर देखभाल की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में केवल 18 वर्ष की उम्र पूरी होने के आधार पर भरण-पोषण रोकना उचित नहीं होगा। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बच्चे की स्थिति और उसकी आत्मनिर्भरता से जुड़े पहलुओं पर विचार किया।
आत्मनिर्भर न होने तक पिता को देना होगा खर्च
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई बच्चा अपनी मानसिक या शारीरिक स्थिति के कारण स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो केवल उसके बालिग हो जाने को भरण-पोषण समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए 7,000 रुपये प्रतिमाह की भरण-पोषण राशि जारी रखने का निर्देश दिया। यह राशि बच्चे के आत्मनिर्भर होने तक जारी रहेगी।