KONDAGAON NEWS. आपने इंसानों की अदालत के बारे में तो खूब सुना होगा, लेकिन क्या कभी ऐसी अदालत के बारे में सुना है जहां देवी-देवताओं को भी अपने काम का हिसाब देना पड़ता है और गलती साबित होने पर उन्हें सजा सुनाई जाती है? छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के केशकाल में सदियों से चली आ रही एक अनोखी आदिम परंपरा आज भी लोगों के बीच आस्था का केंद्र बनी हुई है। केशकाल की प्रसिद्ध 10 मोड़ों वाली सर्पिलाकार घाटी के ऊपर टाटामारी पर्यटन मार्ग पर स्थित भंगाराम माई के दरबार में हर साल देवी-देवताओं की अदालत लगती है। इस साल भी भादो जातरा के मौके पर शनिवार, 12 सितंबर को यह अनोखा आयोजन होगा।
भक्त लगाते हैं देवी-देवताओं के खिलाफ शिकायत
स्थानीय मान्यता के अनुसार, सालभर क्षेत्र में पूजे जाने वाले देवी-देवताओं के कामकाज का लेखा-जोखा भंगाराम माई के दरबार में होता है। यदि किसी देवी या देवता से जुड़ी कोई शिकायत सामने आती है या माना जाता है कि उन्होंने अपना दायित्व ठीक से नहीं निभाया, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है।आदिवासी समाज की इस पारंपरिक व्यवस्था में देवी-देवताओं को भी उनके कथित दोष के अनुसार सजा मिलने की मान्यता है। गंभीर मामलों में दंड भी कड़ा माना जाता है। वहीं, जिन देवी-देवताओं का कार्य अच्छा माना जाता है, उन्हें सम्मानित कर उच्च दर्जा दिए जाने की परंपरा है। यानी यहां की मान्यता में देवी-देवताओं के लिए भी एक तरह से अदालत, शिकायत, सुनवाई और सजा की व्यवस्था दिखाई देती है।
भादो जातरा के अंतिम शनिवार को लगता है दरबार
हर साल भादो महीने के कृष्ण पक्ष के शनिवार को यहां भादो जातरा आयोजित की जाती है। जातरा से पहले लगातार छह शनिवार तक विशेष पूजा यानी सेवा की जाती है। इसके बाद सातवें और अंतिम शनिवार को मुख्य जातरा का आयोजन होता है। इस दौरान क्षेत्र के नौ परगना के देवी-देवताओं के साथ बड़ी संख्या में पुजारी, सिरहा, गुनिया, मांझी, गायता और अन्य पारंपरिक पदाधिकारी भंगाराम माई के दरबार में पहुंचते हैं।
जातरा के दिन महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित
भंगाराम मंदिर के पुजारी सरजू गौर के मुताबिक, जातरा शनिवार के दिन ही आयोजित होती है और क्षेत्र के अलग-अलग देवी-देवताओं का भंगाराम माई के दरबार में हाजिरी देना जरूरी माना जाता है।स्थानीय परंपरा के अनुसार, जातरा के दिन महिलाओं के मंदिर परिसर में आने पर प्रतिबंध रहता है। देवी-देवताओं को फूल, पान-सुपारी और पारंपरिक रूप से मुर्गा, बकरा-बकरी आदि अर्पित कर प्रसन्न करने की मान्यता है।
बिना अनुमति नए देवता की पूजा नहीं
इस परंपरा से जुड़ी एक और मान्यता बेहद खास है। स्थानीय लोगों के अनुसार, भंगाराम माई की अनुमति और मान्यता के बिना किसी नए देवी-देवता की पूजा शुरू करने का प्रावधान नहीं है। मेले में दूर-दराज के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। आदिम संस्कृति और स्थानीय आस्था से जुड़ी यह परंपरा आज भी क्षेत्र के लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।