नई दिल्ली : पिछले कुछ हफ्तों में चीनी की कीमतों में जिस तेजी ने आम लोगों की चिंता बढ़ाई थी, अब उसमें नरमी के संकेत दिखने लगे हैं। चीनी की एक्स-मिल कीमत में करीब 20 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। इसका असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार में भी दिखाई देने लगा है। हालांकि दुकानों पर ग्राहकों को अभी भी चीनी पहले के मुकाबले महंगी मिल रही है। इसकी बड़ी वजह यह है कि मिल से निकलने वाली चीनी को थोक बाजार और फिर खुदरा दुकानों तक पहुंचने में समय लगता है।अब सितंबर से सरकार की नई सप्लाई व्यवस्था और अक्टूबर-नवंबर में नए चीनी सीजन की शुरुआत कीमतों के लिए अहम साबित हो सकती है।
पहले कितनी बढ़ गई थी चीनी की कीमत?
चीनी की औसत खुदरा कीमत में जुलाई और अगस्त के दौरान तेज उछाल आया। 20 जुलाई को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलो थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। इसके बाद कीमतों में और तेजी आई और 26 अगस्त को औसत खुदरा भाव करीब 65.06 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया। यानी करीब एक महीने के भीतर चीनी की कीमत में लगभग 35 फीसदी तक का उछाल देखने को मिला। हालांकि 27 अगस्त को इसमें मामूली राहत आई और अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत घटकर करीब 64.33 रुपये प्रति किलो रह गई। फिलहाल यह गिरावट बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन बाजार में कीमतों के रुख में बदलाव का संकेत जरूर माना जा रहा है।
एक्स-मिल कीमत में करीब 20 फीसदी की गिरावट
चीनी की कीमत में सबसे पहले गिरावट मिल स्तर पर देखने को मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक एक्स-मिल कीमत एक समय करीब 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी।अब यह घटकर लगभग 55 रुपये प्रति किलो के आसपास आ गई है। यानी करीब 12 रुपये प्रति किलो की कमी हुई है, जो लगभग 18 फीसदी बैठती है। सरकार ने 28 अगस्त को एक्स-मिल कीमत में व्यापक रूप से करीब 20 फीसदी की गिरावट की बात कही है।महाराष्ट्र के कुछ बाजारों में भी चीनी का भाव करीब 62 रुपये से घटकर 51-52 रुपये प्रति किलो के आसपास आने की जानकारी है।
फिर दुकानों पर चीनी इतनी महंगी क्यों?
एक्स-मिल कीमत घटने का मतलब यह नहीं है कि उसी दिन दुकानों पर भी चीनी उतनी ही सस्ती हो जाएगी।दरअसल, चीनी मिल से निकलने के बाद कई चरणों से गुजरकर उपभोक्ता तक पहुंचती है। इसमें थोक व्यापारी, डीलर और खुदरा दुकानदार शामिल होते हैं। इसके साथ ट्रांसपोर्ट, भंडारण और व्यापारियों का मार्जिन भी जुड़ता है।यही वजह है कि मिल स्तर पर कीमत कम होने और खुदरा बाजार में उसका असर दिखने के बीच कुछ समय का अंतर हो सकता है।सरकार का मानना है कि कम कीमत पर मिलों से निकलने वाली चीनी जैसे-जैसे बाजार में पहुंचेगी, खुदरा कीमतों में भी राहत बढ़ सकती है।
सरकार सितंबर से क्यों बदल रही है सप्लाई व्यवस्था?
चीनी की कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार सितंबर से इसकी बिक्री और सप्लाई का तरीका बदलने जा रही है।अब तक मिलों को पूरे महीने के लिए चीनी बिक्री का कोटा दिया जाता था। नई व्यवस्था में इसे पखवाड़े के आधार पर बांटा जाएगा।इसके तहत मिलों को तय मात्रा में से कम से कम 40 फीसदी चीनी पहले सप्ताह में बाजार में भेजनी होगी और बाकी मात्रा अगले सप्ताह में जारी करनी होगी।इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार में चीनी की सप्लाई को लगातार बनाए रखना है।
7 दिन में बाजार तक पहुंचानी होगी चीनी
नई व्यवस्था में मिलों को बेची गई चीनी को 7 दिनों के भीतर बाजार के लिए भेजना अनिवार्य होगा।इससे चीनी को मिलों में रोककर रखने की संभावना कम होगी और बाजार में नियमित सप्लाई बनी रहने की उम्मीद है।सरकार का फोकस मांग और सप्लाई पर लगातार नजर रखने का भी है, ताकि अगर किसी समय बाजार में उपलब्धता कम होती दिखे तो स्थिति को संभाला जा सके।
अक्टूबर-नवंबर में क्यों सस्ती हो सकती है चीनी?
चीनी की कीमतों के लिए अक्टूबर और नवंबर का समय सबसे अहम हो सकता है। इसकी वजह नए चीनी सीजन में उत्पादन का बढ़ना है।सरकार के मुताबिक गन्ने की पेराई 15 अक्टूबर से शुरू होने की उम्मीद है।अक्टूबर में 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक चीनी उत्पादन का अनुमान है, जबकि नवंबर में उत्पादन करीब 45 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने की उम्मीद जताई गई है।जैसे-जैसे नया उत्पादन बाजार में आएगा, चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी। इससे सप्लाई मजबूत होने पर कीमतों पर नीचे आने का दबाव बन सकता है।
सितंबर में भी बढ़ सकती है बाजार की सप्लाई
राहत के लिए अक्टूबर तक इंतजार करना जरूरी नहीं हो सकता। महाराष्ट्र और कर्नाटक में सितंबर के दौरान चालू मिलों से करीब 2 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त चीनी बाजार में आने का अनुमान है।अगर यह सप्लाई समय पर बाजार में पहुंचती है, तो सितंबर से ही कीमतों में नरमी का असर और स्पष्ट हो सकता है।हालांकि खुदरा कीमत कितनी घटेगी, यह बाजार की मांग, सप्लाई और व्यापारियों के मार्जिन समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।
क्या अक्टूबर के बाद बड़ी गिरावट आ सकती है?
अक्टूबर के दूसरे हिस्से से नए सीजन की चीनी बाजार में पहुंचनी शुरू होने की उम्मीद है। नवंबर में उत्पादन बढ़ने के साथ उपलब्धता और मजबूत हो सकती है।इसलिए अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के बीच चीनी की कीमतों में ज्यादा राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।लेकिन यह कहना अभी मुश्किल है कि खुदरा बाजार में कीमत किस स्तर तक पहुंचेगी। उत्पादन और वास्तविक बाजार सप्लाई के आंकड़े सामने आने के बाद तस्वीर ज्यादा साफ होगी।
त्योहारों में बढ़ सकती है चीनी की मांग
चीनी की कीमतों में गिरावट के बीच एक चुनौती त्योहारी सीजन भी है।सितंबर से देश में त्योहारों का दौर शुरू हो जाता है। इस दौरान मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और दूसरे खाद्य उत्पादों में चीनी की खपत बढ़ जाती है।अगर मांग तेजी से बढ़ी और बाजार में उसी अनुपात में सप्लाई नहीं पहुंची, तो कीमतों पर दोबारा दबाव बन सकता है। यही वजह है कि सितंबर से नवंबर के बीच चीनी की कीमतों का रुख केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि त्योहारों की मांग से भी तय होगा।
जमाखोरी पर सरकार की नजर
सरकार के मुताबिक हाल की कीमत वृद्धि का कारण चीनी की वास्तविक कमी नहीं थी। भौतिक सत्यापन के दौरान कई मिलों के पास पर्याप्त स्टॉक पाया गया। कुछ मामलों में मिलों के पास घोषित स्टॉक से अधिक चीनी भी मिली। सरकार ने कीमतों में तेजी के पीछे जमाखोरी और सट्टेबाजी की भूमिका की बात कही है।इसी कारण स्टॉक, बिक्री और बाजार में चीनी की उपलब्धता पर निगरानी बढ़ाई जा रही है। महाराष्ट्र में भी जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा से जुड़े कदम उठाए गए हैं।
आम लोगों को कब मिल सकती है सस्ती चीनी?
मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो सितंबर से चीनी की कीमतों में धीरे-धीरे राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं अक्टूबर के दूसरे हिस्से से नया उत्पादन बढ़ने और नवंबर में सप्लाई मजबूत होने के बाद कीमतों में ज्यादा गिरावट की संभावना बन सकती है।हालांकि त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से कीमतों में फिर उतार-चढ़ाव आ सकता है।कुल मिलाकर आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों के लिए सितंबर की नई सप्लाई व्यवस्था, अक्टूबर से शुरू होने वाला नया उत्पादन और नवंबर की मजबूत उपलब्धता सबसे अहम फैक्टर रहने वाले हैं।