Chhattisgarh News: हैदराबाद/रायपुर। बस्तर के सुदूर पहाड़ों और गांवों की पगडंडियों पर नंगे पैर दौड़ने वाले युवा अब देश की बड़ी शहरी मैराथन में अपना दम दिखाने जा रहे हैं। संसाधनों की कमी, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और खेल सुविधाओं के अभाव के बावजूद इन युवाओं ने अपने हौसले को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया।
अब बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, बैलाडिला और जगदलपुर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से चुने गए 184 युवा धावक 30 अगस्त को एनएमडीसी हैदराबाद मैराथन में दौड़ेंगे। इनमें छह महिला धावक भी शामिल हैं। कई युवाओं के लिए इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेने का यह पहला अवसर होगा।
कभी जूते नहीं थे, अब राष्ट्रीय मंच पर दौड़ेंगे
इन युवाओं की कहानी केवल एक मैराथन में हिस्सा लेने की नहीं है, बल्कि संघर्ष से अवसर तक पहुंचने की कहानी है। उचित रनिंग शूज़ और खेल संसाधनों के अभाव में कई युवा बैलाडिला की कठिन पहाड़ियों और ग्रामीण रास्तों पर नंगे पैर अभ्यास करते रहे।
कठिन चढ़ाइयों, पथरीले रास्तों और सीमित सुविधाओं के बीच तैयार हुए इन युवाओं का जज्बा अब देश के हजारों धावकों के बीच दिखाई देगा।
बैलाडिला की पहाड़ियों ने इन धावकों को केवल दौड़ना नहीं सिखाया, बल्कि कठिन परिस्थितियों से लड़ने की ताकत, सहनशीलता और स्टैमिना भी दिया। अब वही युवा आधुनिक खेल सुविधाओं और एक बड़े राष्ट्रीय मंच के बीच अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं।
एनएमडीसी ने थामा बस्तर की प्रतिभा का हाथ
इस प्रेरणादायक सफर में एनएमडीसी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। संगठन ने इन युवा धावकों की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें हैदराबाद मैराथन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाई है।
एनएमडीसी ने न केवल इनके प्रशिक्षण को प्रायोजित किया, बल्कि धावकों को रनिंग शूज़, किट और अन्य आवश्यक खेल सामग्री भी उपलब्ध कराई। उनके रहने और परिवहन की समुचित व्यवस्था भी की गई है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के सुदूर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन अक्सर उन्हें सही मंच और संसाधन नहीं मिल पाते। एनएमडीसी की इस पहल ने बस्तर के युवाओं के सामने एक नई संभावना खड़ी की है।
17 अगस्त से कड़ी तैयारी, पहाड़ों पर बहा रहे पसीना
इन युवा धावकों की तैयारी 17 अगस्त से लगातार जारी है। किरंदुल और बचेली के आसपास की पहाड़ियों में अभ्यास करने वाले युवाओं सहित अलग-अलग समूहों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
प्रशिक्षक विवेक का मानना है कि इन युवाओं में क्षमता की कोई कमी नहीं है। अलग-अलग अनुभव स्तर के धावकों के बीच कुछ ऐसी प्रतिभाएं भी सामने आई हैं, जो भविष्य में पेशेवर एथलीट के रूप में विकसित हो सकती हैं।
यदि उन्हें लगातार कोचिंग, बेहतर सुविधाएं और प्रतिस्पर्धी आयोजनों का अवसर मिलता रहा, तो बस्तर की इन्हीं पहाड़ियों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के धावक निकल सकते हैं।
32 हजार धावकों के बीच बस्तर का दम
एनएमडीसी हैदराबाद मैराथन में कुल 32,000 प्रतिभागी विभिन्न श्रेणियों में हिस्सा लेंगे। बस्तर के युवा धावक 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर, हाफ मैराथन यानी 21.1 किलोमीटर और फुल मैराथन यानी 42.2 किलोमीटर की अलग-अलग श्रेणियों में अपनी चुनौती स्वीकार करेंगे।
184 धावकों में अधिकांश युवा 10 किलोमीटर की दौड़ में भाग लेंगे, जबकि अनुभवी धावकों का एक छोटा समूह 21.1 और 42.2 किलोमीटर की दौड़ में भी हिस्सा लेगा।
विजेताओं के लिए कुल 45 लाख रुपये का पुरस्कार कोष रखा गया है, लेकिन बस्तर के इन युवाओं के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि केवल पुरस्कार जीतना नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े मंचों में से एक पर अपनी क्षमता साबित करना है।
“मैराथन से बढ़कर है यह अवसर”
एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक अमिताभ मुखर्जी ने कहा कि हैदराबाद मैराथन का उद्देश्य केवल दौड़ आयोजित करना नहीं, बल्कि अवसर पैदा करना भी है।
उन्होंने बस्तर के सुदूर और आदिवासी इलाकों के उन युवाओं की यात्रा को विशेष रूप से प्रेरणादायक बताया, जिन्होंने गांवों की पगडंडियों पर नंगे पैर अभ्यास करने से लेकर अब एक बड़े राष्ट्रीय मंच तक का सफर तय किया है।
मैराथन के रेस डायरेक्टर राजेश वेच्चा ने भी इस पहल को बेहद अर्थपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे बस्तर के युवाओं को देशभर के हजारों धावकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने, अनुभव हासिल करने और अपनी एथलेटिक क्षमता को पहचानने का अवसर मिलेगा।
यह सिर्फ दौड़ नहीं, बस्तर के सपनों की उड़ान है
30 अगस्त को जब हैदराबाद में हजारों धावक शुरुआती रेखा पर खड़े होंगे, तब उनमें बस्तर के 184 युवा भी होंगे। लेकिन उनकी कहानी बाकी प्रतिभागियों से कुछ अलग होगी।
क्योंकि उनकी दौड़ शायद हैदराबाद से शुरू होगी, लेकिन उनका सफर बहुत पहले शुरू हो चुका है—बस्तर के सुदूर गांवों की पगडंडियों से, बैलाडिला की पहाड़ियों से और कई बार बिना जूतों के।
आज उनके पैरों में रनिंग शूज़ हैं, हाथ में अवसर है और आंखों में बड़े सपने हैं।
एनएमडीसी की इस पहल ने यह साबित किया है कि यदि सुदूर क्षेत्रों की प्रतिभाओं को सही मंच, प्रशिक्षण और संसाधन मिलें, तो वे किसी से पीछे नहीं हैं।
अब देखना यह है कि बस्तर की पहाड़ियों में तैयार हुआ यह जज्बा हैदराबाद की सड़कों पर कितनी दूर तक दौड़ता है। शायद इन 184 युवाओं में से कुछ आने वाले वर्षों में देश की बड़ी एथलेटिक पहचान बनें।
नंगे पैर पगडंडियों से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की यह यात्रा सिर्फ 184 धावकों की कहानी नहीं है—यह बस्तर के जज्बे, प्रतिभा और कभी हार न मानने वाले हौसले की कहानी है।
