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सब-इंजीनियर के भ्रष्टाचार से निगम में हड़कंप करप्शन का रायता ऐसा फैला कि समेट नहीं पा रहा

नगर निगम में इन दिनों एक सब-इंजीनियर के भ्रष्टाचार के चलते हड़कंप मचा हुआ है। अधिकारी और जनप्रतिनिधी भी इस स्थिति को लेकर असहज हैं। वैसे तो वह सिर्फ सब-इंजीनियर है, लेकिन जोड़-तोड़ कर उसने AE (असिस्टेंट इंजीनियर) का प्रभार भी ले लिया है। सीनियरिटी लिस्ट को दरकिनार कर उसे AE का चार्ज दिया गया है। इससे उसकी मनमानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।इस खबर में आप पढ़ेंगे कि कैसे एक सब-इंजीनियर ने पूरे सिस्टम को हाईजैक कर रखा है। वैसे तो इसके ज्यादातर भ्रष्टाचार पिछली सरकार के समय हुए हैं, लेकिन अब टेंडर की समय-सीमा बची होने या चर्चाओं में आने के कारण ये भ्रष्टाचार सामने आ रहे हैं। साथी अधिकारी बताते हैं कि यह प्लानिंग के साथ खुद को कवर करने में माहिर है।

इसकी खासियत यह है कि यह जो भी काम करता है, उसकी फाइल का एक पन्ना भी दूसरे अधिकारी नहीं देख पाते। टेंडर, काम और भुगतान—हर फाइल इसके कब्जे में रहती है।अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए यह बड़े अधिकारियों को झांसे में रखने में माहिर है। लेकिन इसके बारे में एक बात तय है कि जहां यह रहता है, वहां आसपास के अधिकारियों का नाम भी खराब हो जाता है। इसकी इन्हीं हरकतों के कारण एक IAS अधिकारी ने इसे अपने पास फटकने तक नहीं दिया था। जबकि यह कुछ बेहद सीनियर अधिकारियों को “भैया-भैया” कहकर लटकने का प्रयास करता रहता है। फिलहाल इसके आधा दर्जन काम, करोड़ों रुपये के भुगतान और उनमें भ्रष्टाचार की बातें सामने आ चुकी हैं, जिसके कारण यह घबराया हुआ है।

अब बात करते हैं इसके भ्रष्टाचार की…

मंत्री और अधिकारी का पैसा दबाया

बताया जाता है कि यह सब-इंजीनियर पूर्व में एक पूर्व मंत्री के पैसों को मैनेज करता था। सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि मंत्री के विभाग के ठेकों के नीति निर्धारण और आबंटन पर भी इसकी पकड़ थी।इसके बाद राज्य में सरकार बदल गई। सरकार बदलने के बाद मंत्री भी बदल गए, लेकिन अपने काम में शातिर इस व्यक्ति ने नए और पहली बार बने मंत्री को भी अपने झांसे में ले लिया। इसने सिर्फ मंत्री ही नहीं, बल्कि विभाग की बेहद सीनियर अधिकारी को भी विश्वास में ले लिया और उनका पैसा भी हैंडल करने लगा। लेकिन कहते हैं न कि आदतें आसानी से नहीं जाती । भाई साहब ने अपनी आदतों के अनुसार मंत्री जी और साहब का ही पैसा दबा दिया। कुछ महीनों तक दोनों पैसा निकलवाने का प्रयास करते रहे और यह टालता रहा। लेकिन जैसे ही दोनों को समझ आया कि पैसा निकलने वाला नहीं है, इसके बाद इसका विभाग बदलकर इसे वापस निगम भेज दिया गया। निगम भेजने के साथ ही साफ निर्देश दिए गए कि इसे किसी प्रकार की जिम्मेदारी और काम नहीं देना है।

विभागों में खबरें आग की तरह नहीं फैलतीं, बल्कि जिस तरह सब्जी का छौंक घर के हर कमरे में पहुंच जाता है, उसी तरह इसके निगम पहुंचने से पहले ही इसकी करतूतों की जानकारी मुख्यालय तक पहुंच गई थी। निगम आने पर यहां बैठे IAS अधिकारी ने इसे अपने पास फटकने नहीं दिया। लेकिन यह अपने काम में माहिर था। सरकार बदली थी, तो इसने कुछ दूसरे लोगों के साथ अपना जाल बिछाना शुरू किया और गणपति जी का नाम लेकर टेंडरों में खेल करना शुरू कर दिया।

भ्रष्टाचार के पौधे उगाने में माहिर

जैसे वन विभाग में CAMPA फंड भ्रष्टाचार का बड़ा साधन है, उसी प्रकार निगम और अन्य विभागों में पौधारोपण/वृक्षारोपण कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। यह सब-इंजीनियर इसमें भी माहिर है।निगम को पिछली निकाय सरकार के समय पौधारोपण के नाम पर देवेंद्र नगर का एक ठेकेदार लगभग दो करोड़ रुपये का चूना लगा चुका था। इसी बीच साल 2022-2023 में इस सब-इंजीनियर ने भ्रष्टाचार का एक और प्लान तैयार कर लिया।शहर की लगभग आधा दर्जन जगहों पर पेड़ लगाने के लिए 3 करोड़ रुपये का ठेका निकाला गया और गणेश जी का नाम लेकर यह ठेका उसी नाम की कंपनी को दे दिया गया, जो उसका करीबी या सीधे कहें तो रिश्तेदार था।ठेकेदार ने सब-इंजीनियर के साथ मिलकर ऐसा खेल किया कि लगभग डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा का वारा-न्यारा हो गया। इसमें 50 लाख रुपये का मार्जिन तो था ही, वहीं लगभग एक करोड़ रुपये का सीधा घपला कर दिया गया। यह घपला अभी भी फिजिकली वेरिफाई किया जा सकता है।घपला सामने आने के बाद इसकी जांच शुरू हो गई है।

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे

भ्रष्टाचार के पौधे लगाने के बाद इसने फिर से करप्शन का नया प्लान बनाया। हैरानी की बात यह है कि खेल करने के लिए निगम मुख्यालय के पास ही जगह चुनी।एक बार फिर निगम की लगभग 50 हजार वर्गफीट जमीन, जिस पर गार्डन था, उसे कौड़ियों के दाम पर गणेश जी के नाम वाली उसी कंपनी को दे दिया गया, जिसने पेड़ लगाने के नाम पर पहले ही लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का घपला किया था। ठेके में दर्जनों शर्तें थीं—गार्डन को सुंदर बनाना, मेंटेन करना, पानी देना, सफाई करना। लेकिन हुआ इसका उल्टा। यहां अधिकारी ने अपने रिश्तेदार की चौपाटी खुलवा दी। कारोबारी को गार्डन की जमीन के बदले सिर्फ 39 लाख रुपये देना था। कारोबारी ने यहां लगभग 15 दुकानें खुलवा दीं, जिससे हर महीने लाखों रुपये की कमाई होने लगी। लेकिन बदले में जो काम करना था, वह कभी किया ही नहीं गया। उल्टा, यहां टहलने और घूमने आने वाले लोगों के लिए यह जगह गंदगी के कारण लगभग बंद हो गया। बदले में कारोबारी और अधिकारी मिलकर लाखों रुपये कमा चुके हैं।

 

विज्ञप्ति के माध्यम से 50 लाख रुपये का चूना

नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी है, लेकिन भ्रष्टाचार के इनोवेटिव आइडिया निकालने में माहिर इस सब-इंजीनियर ने जनसंपर्क विभाग को भी मोहरा बना लिया। अधिकारियों को झांसे में लेकर निगम के जनसंपर्क विभाग की पैरेलल विज्ञप्ति जारी करने और निगम की गतिविधियों के प्रचार-प्रसार का सब्जबाग दिखाकर इसने एक टेंडर करवाया। टेंडर मिला इसी सब-इंजीनियर के बेहद करीबी की कंपनी को। महीनों तक इस कंपनी को लगभग साढ़े छह लाख रुपये प्रति माह का भुगतान किया गया। कंपनी का काम सिर्फ इतना था कि निगम के जनसंपर्क अधिकारी द्वारा बनाई गई विज्ञप्ति को कॉपी-पेस्ट कर अंग्रेजी में ट्रांसलेट कर देना। ये विज्ञप्तियां भी कभी बाहर दिखाई नहीं देतीं।कुल मिलाकर कंपनी का काम सिर्फ कागजों पर है और निगम को इससे एक रुपये का भी लाभ नहीं हो रहा है।

अधिकारी के साथ पार्टियों की चर्चा आम

पूरे नगर निगम में चर्चा है कि इस सब-इंजीनियर ने एक अधिकारी को सेट करके रखा है। लगभग हर दिन शराब पार्टियां चल रही हैं। दोनों हर दिन बाहर महंगे होटलों में खाना-पीना कर रहे हैं, जिनका हजारों रुपये का बिल आता है। इस शराब-मुर्गा पार्टी की फोटो भी बाहर आई है। वैसे इन साहब की पोस्टिंग, ट्रांसफर और नियुक्ति के चर्चे भी काफी रोचक हैं, जिसके बारे में बाद में बताएंगे।

बिल्डिंग निगम की, लाखो कमा रहे करीबी, निगम को मिला ठेंगा

इनोवेशन के नाम पर इस सब-इंजीनियर ने कमाई के लिए सरकारी भवनों को भी कमाई का जरिया बना रखा है। जिन बिल्डिंगों की जगहों को इस्तेमाल कर नगर निगम लाखों रुपये की इनकम कर सकता था, उसे इसने अपने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने का जरिया बना लिया। वर्किंग स्पेस का सब्जबाग दिखाकर इसने निगम और सरकारी एजेंसी से करोड़ों रुपये खर्च कराए। लेकिन तैयार होने के दौरान ही इसने बड़ी बिल्डिंगों के टॉप फ्लोर को अपने करीबियों को दे दिया। अब स्थिति यह है कि दो कंपनियां सरकारी भवनों से लाखों रुपये कमा रही हैं, लेकिन निगम को इससे कोई इनकम नहीं हो रही। हर कुर्सी के लिए एजेंसी को हर दिन हजारों रुपये मिल रहे हैं, जबकि निगम को ठेंगा। इस सब-इंजीनियर की करतूतों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगली खबर में पढ़िएगा कि कैसे यह सह-परिवार निगम को लगातार चूना लगा रहा है। सीनियर अधिकारी बदनाम हो रहे हैं और इसके करीबी हर महीने लाखों रुपये कमा रहे हैं।

 

पिक्चर अभी बाकि है……….

इस सब-इंजीनियर की करतूतों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगली खबर में पढ़िएगा कि कैसे यह सह-परिवार निगम को लगातार चूना लगा रहा है। सीनियर अधिकारी बदनाम हो रहे हैं और इसके करीबी हर महीने लाखों रुपये कमा रहे हैं। हम आगे बाकि की करतूत बताएंगे….इंतजार करिएगा पिक्चर अभी बाकि है।