छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को पहले से पता है कि पुरुष शादीशुदा है और वह उसके साथ संबंध बनाती है, तो बाद में वह उस पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने या धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकती। जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की एकल पीठ ने निचली अदालत के आरोपी को बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।
मामले के अनुसार, डोंगरगढ़ की एक महिला ने दावा किया था कि उसकी शादी 8 मई 2008 को महेश गंजीर से हुई थी और 21 जनवरी 2009 को दोनों ने शादी का इकरारनामा भी तैयार किया। महिला का कहना था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रहे और इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध भी बने। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसने विभिन्न यात्राओं पर करीब 85 हजार रुपए खर्च किए, लेकिन बाद में और पैसे देने से इनकार करने पर आरोपी ने उसे घर से निकाल दिया।
इसके बाद महिला ने महेश के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया, लेकिन निचली अदालत ने साक्ष्यों में विरोधाभास पाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि महिला के पहले दिए गए नोटिस और पुलिस शिकायत में शादी की कोई स्पष्ट तारीख नहीं थी, बल्कि केवल यह उल्लेख था कि मई से सितंबर 2008 के बीच शादी के बहाने संबंध बनाए गए।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि महिला को पहले से ही पता था कि महेश शादीशुदा है और उसकी पहली पत्नी का नाम भी उसे मालूम था। इसी आधार पर अदालत ने माना कि धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध तभी बनता है जब पुरुष महिला को यह विश्वास दिलाए कि वह उसकी वैध पत्नी है। लेकिन जब दोनों पक्षों को पता हो कि वे कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं और पुरुष की पहली पत्नी जीवित है, तो धोखाधड़ी का प्रश्न ही नहीं उठता।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में किया गया विवाह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत स्वतः शून्य (अमान्य) माना जाएगा।




