पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का खतरा! कच्चा तेल 97 डॉलर पार, OMCs ने बताया कब बढ़ेंगे रेट
CRUDE OIL PRICE. कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार तेजी देखने को मिल रही है। 28 अगस्त के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 10 फीसदी महंगा हो चुका है। 2 सितंबर की दोपहर ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई थी। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, फिलहाल सरकारी तेल कंपनियों की ओर से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का कोई फैसला नहीं लिया गया है। लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 95 से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो घरेलू ईंधन की कीमतों की समीक्षा की स्थिति बन सकती है।
85-90 डॉलर तक कीमतों का बोझ उठा सकती हैं OMCs
मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) करीब 85-90 डॉलर प्रति बैरल के क्रूड प्राइस तक पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कीमतों को संभाल सकती हैं। इस स्तर पर कंपनियां लगभग ब्रेक-ईवन की स्थिति में काम कर सकती हैं। यानी फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बावजूद आम उपभोक्ताओं पर तुरंत पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा कम है। हालांकि, अगर क्रूड लगातार 95-100 डॉलर या उससे ऊपर बना रहता है तो कंपनियों के लिए मौजूदा कीमतों पर बिक्री करना मुश्किल हो सकता है।
28 अगस्त के बाद 10 फीसदी से ज्यादा चढ़ा ब्रेंट क्रूड
2 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था। पिछले दो दिनों में इसकी कीमत में 5 डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। वहीं 28 अगस्त के बाद से इसमें 8 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा यानी करीब 10 फीसदी की तेजी देखने को मिली है।अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल के पीछे भू-राजनीतिक तनाव को प्रमुख वजह माना जा रहा है। इससे पहले भी युद्ध और आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण क्रूड की कीमतें 100 डॉलर के पार जा चुकी हैं।
पेट्रोल पर मुनाफा, डीजल पर नुकसान
ICRA के आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा समय में OMCs को पेट्रोल की बिक्री पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर का मार्केटिंग मार्जिन मिल रहा है। वहीं डीजल की बिक्री पर करीब 15 रुपये प्रति लीटर का नेगेटिव मार्केटिंग मार्जिन बताया गया है। ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, अपनी रिफाइनरियों में तैयार होने वाले उत्पादों के मामले में कंपनियां 85-90 डॉलर प्रति बैरल के क्रूड स्तर पर ब्रेक-ईवन हासिल कर सकती हैं। हालांकि, बाहर से डीजल खरीदने पर कंपनियों को कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत करीब 90.19 डॉलर प्रति बैरल रही।
कब बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल OMCs को रिफाइनिंग से मिलने वाला बेहतर मार्जिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के असर को कुछ हद तक संतुलित कर रहा है। इसलिए तुरंत पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना कम बताई जा रही है। लेकिन अगर ब्रेंट क्रूड कई हफ्तों तक 95-100 डॉलर प्रति बैरल या इससे ऊपर बना रहता है, तो तेल कंपनियों पर दबाव काफी बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी पर विचार किया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, पहले OMCs का रोजाना नुकसान करीब 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, जो बाद में घटकर लगभग 500 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया।
LPG पर भी कंपनियों को भारी नुकसान
पेट्रोल और डीजल के अलावा घरेलू LPG की बिक्री भी तेल कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। ICRA के अनुमान के मुताबिक, OMCs को एक घरेलू LPG सिलेंडर की बिक्री पर करीब 200 रुपये की अंडर-रिकवरी हो रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने 10 अगस्त को राज्यसभा में बताया था कि 31 जुलाई तक घरेलू LPG बिक्री पर OMCs का कुल नुकसान 59,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका था। सरकार की ओर से वित्त वर्ष 2027 तक करीब 52,000 करोड़ रुपये के मुआवजे का प्रावधान बताया गया है। Indian Oil, BPCL और HPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियां घरेलू उपभोक्ताओं को बाजार कीमत से कम दर पर LPG उपलब्ध करा रही हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय LPG कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ रहा है।
फिलहाल राहत, लेकिन क्रूड पर नजर
कुल मिलाकर, अभी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम दिखाई दे रही है। OMCs फिलहाल कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का बोझ खुद उठाने की स्थिति में हैं। हालांकि, अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो स्थिति बदल सकती है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव तेल कंपनियों पर बढ़ सकता है और इसका सीधा असर देश के करोड़ों वाहन चालकों की जेब पर पड़ सकता है।