Chhattisgarh News: रायपुर/रायगढ़। छत्तीसगढ़ में खैर की बेशकीमती लकड़ी की कथित तस्करी के बड़े नेटवर्क पर पुलिस ने शिकंजा कस दिया है। खैर तस्करी के बड़े नामों में शामिल मनीष अग्रवाल को रायपुर पुलिस ने उसके दो साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद अब पुलिस और वन विभाग का फोकस उसके पूरे नेटवर्क और उससे जुड़े लोगों तक पहुंचने पर है।

जांच में सामने आया था कि महासमुंद और जांजगीर के जंगलों से खैर की लकड़ी कटवाई जाती थी। इसके बाद लकड़ी को ट्रकों में लोड कर दूसरे राज्यों तक भेजा जाता था। आरोप है कि इन गाड़ियों को वन विभाग के नाकों से पार कराने के लिए भी कथित तौर पर सांठगांठ की जाती थी। महासमुंद के ओडिशा बॉर्डर से जुड़े नाके भी अब जांच के दायरे में हैं। पुलिस यह पता लगा रही है कि किन रास्तों और किन नाकों से लकड़ी से भरी गाड़ियां गुजरती थीं और इस पूरे नेटवर्क में किन लोगों की भूमिका थी।
रायगढ़ के एसएसपी शशिमोहन सिंह जल्द ही पूरे मामले का खुलासा कर सकते हैं। पुलिस ने मनीष के कथित सिंडिकेट द्वारा काटकर ट्रक में लोड किए गए खैर के पेड़ों के तने भी बरामद किए हैं। मनीष की गिरफ्तारी के बाद अब उसके भाई मुकेश अग्रवाल की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
जुलाई में पकड़ा गया था करीब एक करोड़ का माल
इस मामले में जुलाई माह में मनीष अग्रवाल से जुड़े एक परिसर से करीब एक करोड़ रुपए कीमत की लकड़ी पकड़ी गई थी। हीरापुर स्थित एक फैक्ट्री परिसर में बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित श्रेणी की खैर और कहुआ प्रजाति की लकड़ी मिली थी।
जांच के दौरान पता चला था कि परिसर में बाहर से बुलाए गए मजदूरों से लकड़ियों की कटाई कराई जा रही थी। मजदूरों ने पूछताछ में बताया था कि वे करीब 17 ट्रक माल काट चुके थे, जिसे पहले ही सप्लाई किया जा चुका था।
यानी छापे में मिला माल कथित नेटवर्क का पूरा स्टॉक नहीं था। बड़ी मात्रा में लकड़ी पहले ही बाहर भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी।
महासमुंद-जांजगीर से ओडिशा बॉर्डर तक निगाह
जांच में यह भी सामने आया था कि महासमुंद और जांजगीर क्षेत्र के जंगलों से खैर की लकड़ी कटवाई जाती थी। कटाई के बाद लकड़ी को ट्रकों में भरकर आगे भेजा जाता था।
वन विभाग के नाकों से गाड़ियों की आवाजाही को लेकर भी सवाल उठे थे। महासमुंद के ओडिशा बॉर्डर से जुड़े नाकों पर अब जांच की नजर है। पुलिस यह खंगाल रही है कि लकड़ी से लदे ट्रकों को किन परिस्थितियों में आगे जाने दिया गया और कहीं स्थानीय स्तर पर किसी तरह की सांठगांठ तो नहीं थी।
ओडिशा के जंगलों से उत्तर भारत तक फैली कड़ी
जांच में यह सामने आया था कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और ओडिशा के घने जंगलों से खैर की लकड़ी जुटाई जाती थी। ओडिशा के संबलपुर, पटनागढ़, बलांगीर, बेलपड़ा, कांटाभांजी और खरियार रोड के वन क्षेत्रों से ग्रामीणों और स्थानीय स्तर के लोगों के जरिए लकड़ी जुटाए जाने की बात सामने आई थी।
इसके बाद लकड़ी को अलग-अलग रास्तों से छत्तीसगढ़ लाया जाता था। यहां डंपिंग और री-लोडिंग के बाद इसे दूसरे राज्यों के लिए रवाना किया जाता था। जांच एजेंसियों के मुताबिक नेटवर्क की कड़ियां मध्यप्रदेश से होते हुए उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, झारखंड और हिमाचल प्रदेश तक पहुंचती थीं।
मनीष की गिरफ्तारी के बाद अब इस पूरी सप्लाई चेन की जांच की जा रही है।
फर्जी ट्रांजिट पास और एस्कॉर्ट गाड़ियों का खेल
जांच में तस्करी के लिए कथित तौर पर फर्जी NTPS/ट्रांजिट पास, फर्जी नंबर प्लेट और एस्कॉर्ट वाहनों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई थी।
लकड़ी से लदे ट्रकों के आगे-पीछे कार और बाइक चलती थीं। इनका इस्तेमाल रास्ते में पुलिस और वन विभाग के नाकों की रेकी के लिए किया जाता था। खतरा दिखाई देने पर ट्रकों को ढाबों, बंद पड़े परिसरों या अन्य सुरक्षित स्थानों पर खड़ा कर दिया जाता था।
जांच में मनीष से जुड़े कई मोबाइल नंबरों और उसके गुर्गों के जरिए कॉन्फ्रेंस कॉल किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
एक करोड़ की खैर और कहुआ लकड़ी ने खोली बड़ी कड़ी
हीरापुर में हुई कार्रवाई के दौरान करीब एक करोड़ रुपए कीमत की प्रतिबंधित श्रेणी की खैर और कहुआ लकड़ी बरामद हुई थी। वहां लकड़ी को काटकर आगे भेजने की व्यवस्था की गई थी।
मजदूरों के बयान के बाद जांच एजेंसियों को यह जानकारी मिली थी कि 17 ट्रक माल पहले ही काटकर सप्लाई किया जा चुका था। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ा और दूसरे राज्यों में लकड़ी पकड़े जाने के मामलों को भी इस नेटवर्क से जोड़कर देखा गया।
‘लाल सोना’ क्यों है खैर?
खैर की लकड़ी से कत्था तैयार किया जाता है। इसका इस्तेमाल पान उद्योग के साथ-साथ चमड़े और कपड़ों की रंगाई तथा आयुर्वेदिक उपयोगों में भी होता है। खैर की लकड़ी की कीमत करीब 8 से 9 हजार रुपए प्रति क्विंटल बताई जाती है।
इसी ऊंची कीमत और मांग के कारण खैर की लकड़ी संगठित तस्करी के लिए बेहद आकर्षक बनी हुई है।
मुकेश अग्रवाल की भूमिका भी जांच के घेरे में
मनीष की गिरफ्तारी के बाद अब जांच उसके करीबी नेटवर्क और पारिवारिक कनेक्शन की ओर भी बढ़ी है। मध्यप्रदेश के सीधी में पकड़ी गई खैर की बड़ी खेप के मामले में मनीष के भाई मुकेश अग्रवाल की भूमिका सामने आने की बात कही गई थी।
अब पुलिस और वन विभाग इस कड़ी को भी जोड़ रहे हैं कि दोनों भाइयों की भूमिका क्या थी और अलग-अलग राज्यों में सामने आए मामलों के बीच आपसी कनेक्शन कितना था।
अब आगे के कनेक्शन खंगाल रही पुलिस
मनीष अग्रवाल की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसके नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।
महासमुंद और जांजगीर के जंगलों से लकड़ी कटवाने से लेकर उसे ट्रकों में लोड कराने, वन नाकों से पार कराने, दूसरे राज्यों तक पहुंचाने और आगे सप्लाई करने तक की पूरी चेन अब जांच के दायरे में है।
पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर यह पता लगा रही है कि लकड़ी की खरीद कौन करता था, ट्रांसपोर्ट कौन संभालता था, फर्जी दस्तावेज कहां तैयार होते थे, किन लोगों की मदद से गाड़ियां नाकों से निकलती थीं और अंतिम स्तर पर माल किसे सप्लाई किया जाता था।
गिरफ्तारी के बाद अब खुलेगा असली नेटवर्क
मनीष अग्रवाल की गिरफ्तारी पुलिस और वन विभाग के लिए बड़ी सफलता है, लेकिन जांच अभी खत्म नहीं हुई है। अब उसके आगे के कनेक्शन, फाइनेंसर, सप्लाई चेन, नाकों पर कथित सांठगांठ और दूसरे राज्यों में जुड़े लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है।
पूछताछ में सामने आने वाले नाम इस पूरे कथित नेटवर्क की अगली तस्वीर साफ कर सकते हैं। अब जांच इस बात पर टिकी है कि ‘लाल सोने’ का यह कारोबार सिर्फ मनीष तक सीमित था या इसके पीछे कई चेहरों वाला पूरा सिंडिकेट काम कर रहा था।
— संदीप शुक्ला
खबर जोरदार / Raw Reporter