Chhattisgarh High Court बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम वैवाहिक विवाद में बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि पत्नी द्वारा पति और उसके परिजनों पर धारा 498ए (दहेज प्रताडऩा) के तहत झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट धमतरी के फैसले को पलटते हुए पति को तलाक की डिक्री दे दी। डिवीजन बेंच न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने यह निर्णय सुनाया। क्या है पूरा मामला धमतरी निवासी धर्मेंद्र साहू का विवाह 28 अप्रैल 2009 को हुआ था। दंपती की दो बेटियां भी हैं। 10 अप्रैल 2017 को पत्नी ने पति, उसके भाई और मां के खिलाफ धारा 498ए (दहेज प्रताडऩा) के तहत मामला दर्ज कराया। इसके बाद पत्नी मायके चली गई और ससुराल नहीं लौटी।
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करीब 5 साल तक चले आपराधिक मुकदमे के बाद 25 अप्रैल 2022 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, धमतरी ने पति, उसके भाई और मां को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इसके खिलाफ पत्नी की अपील भी सत्र न्यायालय ने खारिज कर दी थी और हाईकोर्ट में दायर आपराधिक पुनरीक्षण भी 14 अक्टूबर 2024 को निरस्त हो चुका है। फैमिली कोर्ट ने तलाक से किया था इनकार पति ने फैमिली कोर्ट में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी, लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि पत्नी द्वारा दायर आपराधिक मामलों की अंतिम कार्यवाही उस समय लंबित थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट का फैसला
Chhattisgarh High Court हाईकोर्ट ने कहा कि, पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले में पति और उसके परिजनों का पूरी तरह बरी होना साबित करता है कि आरोप निराधार थे, ऐसे गंभीर आरोपों में लंबे समय तक मुकदमा झेलना, गिरफ्तारी का डर और सामाजिक बदनामी गंभीर मानसिक पीड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि झूठा 498ए केस मानसिक क्रूरता माना जाएगा। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए पति को तलाक की डिक्री दे दी। कोर्ट ने कहा कि, धारा 498ए जैसे गंभीर अपराध में पति और उसके परिवार को झूठे आरोपों में फंसाकर वर्षों तक मुकदमा चलाना मानसिक क्रूरता के समान है।
Chhattisgarh High Court पति को गिरफ्तारी का भय, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आघात और लंबे समय तक आपराधिक ट्रायल झेलना पड़ा, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। जब न्यायालय यह पाता है कि आरोप प्रमाणित नहीं हुए और अभियुक्त पूरी तरह बरी हुए हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि पति के साथ कोई क्रूरता नहीं हुई। ऐसी परिस्थितियों में वैवाहिक संबंध बनाए रखना अन्यायपूर्ण होगा।




