NEW DELHI. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन का एक इंटरव्यू सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इंटरव्यू में भारत के संदर्भ में उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए “इस मनहूस देश” शब्दों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। फिलहाल इस वायरल क्लिप पर उनकी ओर से कोई नया आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
इंटरव्यू में क्या कहा?
बातचीत के दौरान निवेदिता मेनन ने कहा कि CPIM के विरोध प्रदर्शन ने कुछ समय के लिए मुस्लिम समुदाय को यह महसूस कराया कि उनकी आवाज सुनी जा रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि CPIM का प्रोटेस्ट थोड़ा सांस लेने की जगह लेकर आया और मुसलमानों को शायद लगने लगा कि शायद इस मनहूस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है।” उन्होंने आगे दावा किया कि पिछले 10–12 वर्षों में मुस्लिम समुदाय को बार-बार यह महसूस कराया गया कि वे सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई और कथित दमनात्मक माहौल का भी उल्लेख किया। यही टिप्पणी अब विवाद का मुख्य कारण बनी हुई है।
आमिर खान और वामपंथी दलों का भी किया जिक्र
इंटरव्यू में निवेदिता मेनन ने अभिनेता आमिर खान के पुराने बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब आमिर खान ने अपनी पत्नी किरण राव की उस चिंता का उल्लेख किया था कि शायद उन्हें भारत छोड़ने के बारे में सोचना पड़े, तब उन्हें व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि वामपंथी दलों और विशेष रूप से CPIM को इस मुद्दे को गंभीरता से उठाना चाहिए। उनके मुताबिक भविष्य में इस विषय पर फिर से आंदोलन की जरूरत पड़ सकती है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस, आधिकारिक कार्रवाई की जानकारी नहीं
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की राय बंटी हुई है। एक वर्ग ने भारत के लिए “मनहूस देश” जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि पूरे इंटरव्यू को संदर्भ के साथ देखा जाना चाहिए। फिलहाल इस मामले में किसी सरकारी एजेंसी या संबंधित संस्था की ओर से किसी आधिकारिक कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।
कौन हैं निवेदिता मेनन?
निवेदिता मेनन राजनीतिक विचारक, लेखिका और शिक्षाविद हैं। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के सेंटर फॉर कम्पेरेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी में प्रोफेसर रह चुकी हैं और वर्ष 2025 में सेवानिवृत्त हुईं। इससे पहले वह लेडी श्रीराम कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी अध्यापन कर चुकी हैं। राजनीति, लोकतंत्र, जेंडर और समाज से जुड़े विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।