छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक 10 साल पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी स्थापित करने में पूरी तरह असफल रहा है। सिर्फ मेमोरेण्डम बयान और बरामदगी के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराध में सजा नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट के जस्टिस संजय के. अग्रवाल और अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया और आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस के समक्ष आरोपी द्वारा दिया गया कबूलनामा कानूनन साक्ष्य नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मेमोरेण्डम में सिर्फ वही हिस्सा मान्य होता है, जिससे कोई तथ्य खोजा गया हो, न कि अपराध स्वीकार करने वाला बयान।.




